मानव जीवन तथा चित्तवृत्तियाँ : मनुष्य एक सामाजिक प्राणी के रूप में अपनी जीवन-यात्रा पूर्ण करता है। वह ऐसे समाज का हिस्सा है, जो हजारों-लाखों वर्षों में सभ्यता और संस्कृति के वर्तमान स्तर तक पहुँचा है।
इस स्तर को सर्वोच्च तो नहीं, परन्तु उच्चतर अवश्य कहा जा सकता है, जबकि पशुओं में आज भी वही पाशविकता बनी हुई है।यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि मनुष्य संसार का एक सर्वोच्च प्राणी है।
अपनी प्रारम्भिक अवस्था से ही वह अपनी अंतर्निहित जिज्ञासा, चेतना, निरीक्षण, परीक्षण, चिंतन, कल्पना, अनुकरण, सृजन और अन्वेषण जैसी क्षमताओं के कारण आत्मप्रेरित होकर संसार की गतिविधियों में लगा रहा और अनुभवों के आधार पर अपने विकास के मार्ग पर आगे बढ़ता रहा।
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| मानव जीवन तथा चित्तवृत्तियाँ |
मानव विकास और चित्तवृत्तियाँ
मानव विकास की इस प्रक्रिया में मन तथा चित्त की वृत्तियों का बहुत बड़ा योगदान रहा है। अनेक विघ्न-बाधाओं का सामना करने के बावजूद मनुष्य निरंतर आगे बढ़ता रहा।
किन्तु अज्ञानता और अतिरेक के कारण यही चित्तवृत्तियाँ कई बार मनुष्य को भ्रमित भी करती रहीं। यह स्थिति तब तक बनी रही, जब तक मनुष्य को जीव, जगत और ईश्वर के साथ स्वयं का यथार्थ ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ।
वास्तव में, चित्तवृत्तियाँ जहाँ एक ओर विकास में सहायक थीं, वहीं दूसरी ओर वे हानिकारक भी सिद्ध हुईं। परिणामस्वरूप, विकास के साथ-साथ ह्रास भी होता रहा।
चित्तवृत्तियों का प्रभाव
मानव-चिंतन इस स्तर तक नहीं पहुँच सका था कि वह यह समझ सके कि उसके पतन का मुख्य कारण चित्त की चंचलता और इन्द्रियों की दुर्बलता है।
फिर भी, एक धीमी लेकिन निरंतर प्रक्रिया के रूप में मानव जाति का विकास चलता रहा। ज्ञान और सद्संकल्प के अभाव में विकास की गति सीमित रही।
अविद्या रूपी माया के प्रभाव में आकर, सांसारिक विषयों में अत्यधिक आसक्ति और अहंकार ने मनुष्य की सृजनात्मक शक्ति को प्रभावित किया, जिससे उसकी प्रगति बाधित हुई। यदि मनुष्य भोगवाद के स्थान पर सृजन पर ध्यान केंद्रित करता, तो यह पृथ्वी स्वर्ग समान बन सकती थी।
चित्तवृत्तियों पर नियंत्रण
मनुष्य की चित्तवृत्तियाँ मूलतः सत्त्वगुण प्रधान होती हैं, किन्तु रजोगुण और तमोगुण के प्रभाव से वह सुख और दुःख का अनुभव करता है।
इन सुख-दुःख के चक्र से मुक्ति पाने का एकमात्र उपाय है—चित्तवृत्तियों पर नियंत्रण, जो केवल योग साधना के माध्यम से संभव है।
मानव चित्तवृत्तियाँ तथा क्लेश
समस्त संसार दुःखमय है। यदि कहीं सुख है भी, तो वह स्थायी नहीं है और उसमें भी राग तथा द्वेष मिश्रित रहते हैं।
वास्तव में, प्रत्येक प्राणी दुःख के बंधन में बंधा हुआ है। इसका कारण मन, बुद्धि और अहंकार से मिलकर बना अंतःकरण है, जिसे चित्त कहा जाता है।
चित्त और उसकी अवस्थाएँ
चित्त भी मन की ही एक उपाधि है। भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में भिन्न-भिन्न कार्य करने के कारण एक ही मन को कई नामों से अभिहित किया जाता है।
यही मन मनन करने से मन, निर्णय करने से बुद्धि, अभिमान करने से अहंकार, अकारण चिन्तन करने से चित्त, पूर्वानुभूत विषयों का ध्यान करने से स्मृति, विशेष विषय के प्रति अनुरक्ति से वासना, ज्ञान लुप्त हो जाने से अविद्या, अपने कर्मों से ब्रह्म को आवृत करने से माया तथा सांसारिक विषयों का भोग करके अनुभव प्राप्त करने से प्रकृति आदि उपाधियों से भी जाना जाता है।
चित्त की क्षिप्त, मूढ़, विक्षिप्त, एकाग्र और निरुद्ध आदि पाँच स्वाभाविक अवस्थाएँ होती हैं, जिन्हें चित्त की भूमियाँ भी कहा जाता है।
चित्तवृत्ति क्या है
रजोगुण तथा तमोगुण प्रधान संसार के बाह्य तथा भीतरी संसर्ग से चित्त में प्रत्येक क्षण होने वाला परिवर्तन चित्तवृत्ति कहलाता है।
यद्यपि चित्त में सत्त्वगुण का आधिक्य होता है किन्तु एक धर्म, आकार अथवा रूप को त्यागकर दूसरे धर्म, आकार अथवा रूप को धारण करने वाला चित्त संसार के संसर्ग में आकर स्वयं को उसके अनुरूप परिवर्तित कर लेता है।
चित्तवृत्तियों के प्रकार
यद्यपि संसार में असंख्य पदार्थ हैं तथा उनके संसर्ग से चित्त में उत्पन्न होने वाली वृत्तियाँ भी असंख्य हैं किन्तु योग की दृष्टि से इन्हें पाँच भागों में विभक्त किया गया है:
(1) प्रमाण
जिन साधनों से प्रमाता को प्रमेय का ज्ञान होता है, उसे प्रमाण कहते हैं। ये प्रत्यक्ष, अनुमान तथा आगम तीन प्रकार के होते हैं।
(2) विपर्यय
किसी वस्तु के मिथ्याज्ञान से उत्पन्न चित्तवृत्ति को विपर्यय कहते हैं। जैसे रस्सी में सर्प का भ्रम।
(3) विकल्प
वास्तविकता से रहित केवल शब्द ज्ञान पर आधारित वृत्ति को विकल्प वृत्ति कहते हैं। जैसे आकाश-कुसुम।
(4) निद्रा
इस अवस्था में जाग्रत तथा स्वप्न दोनों अवस्थाओं की वृत्तियों का अभाव होता है। इसमें तमोगुण की प्रधानता होती है।
(5) स्मृति
किसी पूर्व अनुभूत विषय की अथावत मानसिक प्रतीति स्मृति कहलाती है।
निष्कर्ष
सुख-दुःख के इस चक्र से बचने का एक मात्र उपाय है, मनुष्य का अपनी चित्तवृत्तियों पर पूर्णतः नियंत्रण प्राप्त कर लेना, जो मात्र योग साधना से ही संभव है।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
Q1. मानव जीवन में चित्तवृत्तियों का क्या महत्व है?
मानव विकास की प्रक्रिया में मनुष्य के मन तथा चित्त की वृत्तियों का बहुत बड़ा योगदान रहा है। इन्ही वृत्तियों के कारण मनुष्य अनेक विघ्न-बाधाओं को झेलते हुए भी उत्तरोत्तर आगे ही बढ़ने का उपक्रम करता रहा है।
Q2. क्या चित्तवृत्तियाँ लाभदायक हैं या हानिकारक?
वास्तविकता यह थी कि मानव चित्तवृत्तियाँ उसके विकास में जितनी उपयोगी सिद्ध हो रही थीं उतनी ही घातक भी। फलतः विकास के साथ-साथ हास भी होता रहा।
Q3. मानव के दुःख का मुख्य कारण क्या है?
समस्त संसार दुःखमय है। वस्तुतः इस संसार का प्राणीमात्र दुःख के जंजाल में फंसा हुआ है क्योंकि मन, बुद्धि तथा अहंकार का सम्मिश्रित मानव-अन्तःकरण ही, जिसे चित्त कहते हैं, इसका कारण है।
Q4. चित्तवृत्ति क्या होती है?
रजोगुण तथा तमोगुण प्रधान संसार के बाह्य तथा भीतरी संसर्ग से चित्त में प्रत्येक क्षण होने वाला परिवर्तन चित्तवृत्ति कहलाता है।
Q5. चित्तवृत्तियों के प्रकार कौन-कौन से हैं?
योग की दृष्टि से इन्हें प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा तथा स्मृति आदि पाँच भागों में विभक्त किया गया है।
Q6. प्रमाण क्या है और इसके प्रकार कौन से हैं?
जिन साधनों से प्रमाता को प्रमेय का ज्ञान होता है, उसे प्रमाण कहते हैं। ये प्रत्यक्ष, अनुमान तथा आगम तीन प्रकार के होते हैं।
Q7. विपर्यय क्या होता है?
किसी वस्तु के मिथ्याज्ञान से उत्पन्न चित्तवृत्ति को विपर्यय कहते हैं। जैसे रस्सी में सर्प का भ्रम हो जाना।
Q8. विकल्प क्या होता है?
वास्तविकता से रहित केवल शब्द ज्ञान पर आधारित वृत्ति को विकल्प वृत्ति कहते हैं। जैसे आकाश-कुसुम।
Q9. निद्रा क्या है?
इस अवस्था में जाग्रत तथा स्वप्न दोनों अवस्थाओं की वृत्तियों का अभाव होता है। इसी अभाव पर आश्रित वृत्ति निद्रा कहलाती है।
Q10. चित्तवृत्तियों पर नियंत्रण कैसे संभव है?
सुख-दुःख के इस चक्र से बचने का एक मात्र उपाय है, मनुष्य का अपनी चित्तवृत्तियों पर पूर्णतः नियंत्रण प्राप्त कर लेना, जो मात्र योग साधना से ही संभव है।
सुख-दुःख के इस चक्र से बचने का एक मात्र उपाय है, मनुष्य का अपनी चित्तवृत्तियों पर पूर्णतः नियंत्रण प्राप्त कर लेना, जो मात्र योग साधना से ही संभव है।
मानव जीवन तथा चित्तवृत्तियाँ के सही ज्ञान से मनुष्य अपने हित-अहित की पहचान कर सकता है और अपने विकास के मार्ग पर आगे बढ़ सकता है।
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