सनातन धर्म की दशमहाविद्याओं में माँ तारा का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। उन्हें ज्ञान, वाणी, संरक्षण, आध्यात्मिक शक्ति तथा मोक्ष प्रदान करने वाली देवी माना जाता है।
तांत्रिक परंपरा में माँ तारा की साधना को विशेष महत्व दिया गया है और माना जाता है कि उनकी कृपा से साधक को मानसिक दृढ़ता, आध्यात्मिक उन्नति तथा कठिन परिस्थितियों से उबरने की शक्ति प्राप्त होती है।
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| माँ तारा देवी – ज्ञान, शक्ति और आध्यात्मिक जागरण की अधिष्ठात्री महाविद्या। |
माँ तारा देवी कौन हैं?
माँ तारा दशमहाविद्याओं में दूसरी महाविद्या मानी जाती हैं। उनका स्वरूप करुणामयी माता और उग्र शक्ति दोनों का संगम है। शास्त्रों में उनके तीन प्रमुख स्वरूप बताए गए हैं—
तारा
एकजटा
नील सरस्वती
यद्यपि शक्ति एक ही है, लेकिन साधकों की आवश्यकता और साधना के उद्देश्य के अनुसार इन स्वरूपों की उपासना की जाती है।
तारा महाविद्या का महत्व
तांत्रिक ग्रंथों में वर्णन मिलता है कि माँ तारा अपने भक्तों को भय, अज्ञान और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा प्रदान करती हैं। उन्हें वाणी की अधिष्ठात्री शक्ति भी माना जाता है।
इसलिए ज्ञान, बुद्धि और आध्यात्मिक विकास की कामना रखने वाले साधक माँ तारा की आराधना करते हैं।
महर्षि वशिष्ठ और माँ तारा
प्राचीन कथाओं के अनुसार महर्षि वशिष्ठ ने प्रारंभ में वैदिक पद्धति से माँ तारा की साधना करने का प्रयास किया था। किंतु बाद में उन्हें तांत्रिक पद्धति का आश्रय लेना पड़ा।
तब जाकर उन्हें माँ तारा की कृपा और सिद्धि प्राप्त हुई। यही कारण है कि तारा महाविद्या को मुख्य रूप से तांत्रिक साधना से संबंधित माना जाता है।
माँ तारा का दिव्य स्वरूप
नीलतंत्र में माँ तारा का वर्णन नीलवर्ण, त्रिनेत्रधारी तथा दिव्य तेज से युक्त देवी के रूप में किया गया है। उनके हाथों में विभिन्न आयुध होते हैं और वे अज्ञान के अंधकार को दूर करने वाली शक्ति का प्रतीक मानी जाती हैं।
माँ तारा देवी शाबर मंत्र
ॐ आदेश गुरु को महाचीन देश महोग्र तारा देवी तहाँ बसै चोल सर, तहाँ बैठे अक्षोभ्य नाग त्रिजटा शिव के माथे। तारा बसे भक्त के साथे। काली तारा, ब्रह्मतारा, छिन्ना हूं त्रीं तारा ह्रीं। आव आव, कह कह, घ घ घ, हः। मेरी भक्ति, गुरु की शक्ति। फुरो मन्त्र ईश्वरो वाचा। फट् स्वाहा॥
महत्वपूर्ण सावधानी
माँ तारा महाविद्या और उनसे संबंधित तांत्रिक साधनाएँ अत्यंत गंभीर विषय मानी जाती हैं। इसलिए किसी भी प्रकार की साधना, अनुष्ठान या मंत्र-जप करने से पहले योग्य गुरु का मार्गदर्शन प्राप्त करना आवश्यक माना जाता है।
निष्कर्ष
माँ तारा देवी ज्ञान, शक्ति और आध्यात्मिक जागरण की प्रतीक हैं। उनकी उपासना भारतीय तांत्रिक परंपरा का एक महत्वपूर्ण अंग रही है।
श्रद्धा, संयम और उचित मार्गदर्शन के साथ की गई आराधना साधक के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती है।
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